सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
क्यो ना गुरूर करू मै अपने आप पे….मुझे उसने चाहा जिसके चाहने वाले हजारो थे!
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
बाप के सामने अय्याशी… और हमारे सामने बदमाशी.. बेटा, भूल कर भी मत करियो..
“बात” उन्हीं की होती है, जिनमें कोई “बात” होती है..!
सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
क्यो ना गुरूर करू मै अपने आप पे….मुझे उसने चाहा जिसके चाहने वाले हजारो थे!
पैसा "हैसियत" बदल सकता है, "औकात" नहीं.
बाप के सामने अय्याशी… और हमारे सामने बदमाशी.. बेटा, भूल कर भी मत करियो..
“बात” उन्हीं की होती है, जिनमें कोई “बात” होती है..!