गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
तुम शरीफ मैं कमीना चल अब निकल जा मेरी प्यारी हसीना
शायरी का बादशाह हुं और कलम मेरी रानी, अल्फाज़ मेरे गुलाम है, बाकी रब की महेरबानी
सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
आग लगाने वालो को कहाँ खबर , रुख हवाओ ने बदला तो खाक वो भी होंगे ..
मेरी औकात देखने के लिए तेरी भी औकात होनी जरुरी है
गुरूर मे इंसान को कभी इंसान नहीं देखता जैसे छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही माकन नहीं देखता
तुम शरीफ मैं कमीना चल अब निकल जा मेरी प्यारी हसीना
शायरी का बादशाह हुं और कलम मेरी रानी, अल्फाज़ मेरे गुलाम है, बाकी रब की महेरबानी
सबर कर अपना किस्सा नहीं कहानी हैं
आग लगाने वालो को कहाँ खबर , रुख हवाओ ने बदला तो खाक वो भी होंगे ..
मेरी औकात देखने के लिए तेरी भी औकात होनी जरुरी है