नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, बुद्धि ग्यान से, और आत्मा धर्म से
जो जग को ना भाया उसे तूने अपनाया, किस चीज़ की लालच देंगे वो हमको जब तू ही मेरा मोह तू ही मेरी माया |
नैन खुले तो दर्शन हो होठ खुले तो कीर्तन हो | याद रखु सतगुरु तेरे नाम को मन भटके तो सुमिरन हो ||
काल भी तुम और महाकाल भी तुम लोक भी तुम और त्रिलोक भी तुम शिव भी तुम और सत्यम भी तुम |
मनुष्य को कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्ति का अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, बुद्धि ग्यान से, और आत्मा धर्म से
जो जग को ना भाया उसे तूने अपनाया, किस चीज़ की लालच देंगे वो हमको जब तू ही मेरा मोह तू ही मेरी माया |
नैन खुले तो दर्शन हो होठ खुले तो कीर्तन हो | याद रखु सतगुरु तेरे नाम को मन भटके तो सुमिरन हो ||
काल भी तुम और महाकाल भी तुम लोक भी तुम और त्रिलोक भी तुम शिव भी तुम और सत्यम भी तुम |
मनुष्य को कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्ति का अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।