खुद ही पागल करते हो फिर कहते हो पागल हो तुम
तू करे ना करे..... मेरा इश़्क काफ़ी है... हम दोनों के लिये
कितने कम लफ्जों मे जिंदगी को बयान करूँ, लो तुम्हारा नाम लेकर किस्सा तमाम करूँ
ए इश्क़, तू ही बता, मैं तेरा अब, क्या हश्र करूँ - दिल जलाऊँ, आँखों से बहाऊँ, या रूह में क़ैद करूँ
उससे बढ़कर मेरी खुशी क्या है, तुम सलामत रहो कमी क्या है,
सच्चे इश्क में अल्फाज़ से ज्यादा एहसास की एहमियत होती है
खुद ही पागल करते हो फिर कहते हो पागल हो तुम
तू करे ना करे..... मेरा इश़्क काफ़ी है... हम दोनों के लिये
कितने कम लफ्जों मे जिंदगी को बयान करूँ, लो तुम्हारा नाम लेकर किस्सा तमाम करूँ
ए इश्क़, तू ही बता, मैं तेरा अब, क्या हश्र करूँ - दिल जलाऊँ, आँखों से बहाऊँ, या रूह में क़ैद करूँ
उससे बढ़कर मेरी खुशी क्या है, तुम सलामत रहो कमी क्या है,
सच्चे इश्क में अल्फाज़ से ज्यादा एहसास की एहमियत होती है