न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की

न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की

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जब पास पैसे थे तब सारी दुनिया साथ थी, आज पास कुछ नहीं तो साथ भी कोई नहीं।

मतलबी दुनिया में लोग अफसोस से कहते है की, कोई किसी का नही…? लेकीन कोई यह नहीं सोचता की हम किसके हुए…

देख के दुनिया अब हम भी बदलेंगे मिजाज़ रिश्ता सब से होगा लेकिन वास्ता किसी से नहीं

दोस्त भी दुश्मन बन जाता है, जब उसे अपना स्वार्थ नजर आता है।

मेरी तारीफ करे या मुझे बदनाम करे, जिसने जो बात करनी है सर-ए-आम करे

हर मित्रता के पीछे कोई न कोई स्वार्थ जरूर छुपा होता है।

जब पास पैसे थे तब सारी दुनिया साथ थी, आज पास कुछ नहीं तो साथ भी कोई नहीं।

मतलबी दुनिया में लोग अफसोस से कहते है की, कोई किसी का नही…? लेकीन कोई यह नहीं सोचता की हम किसके हुए…

देख के दुनिया अब हम भी बदलेंगे मिजाज़ रिश्ता सब से होगा लेकिन वास्ता किसी से नहीं

दोस्त भी दुश्मन बन जाता है, जब उसे अपना स्वार्थ नजर आता है।

मेरी तारीफ करे या मुझे बदनाम करे, जिसने जो बात करनी है सर-ए-आम करे

हर मित्रता के पीछे कोई न कोई स्वार्थ जरूर छुपा होता है।