कैसे करू भरोसा गैरो के प्यार पर, अपने ही मजा लेते अपनो की हार पर
सिखा दिया दुनिया ने मुझे अपनों पे भी शक करना मेरी फ़ितरत में तो था गैरों पे भरोसा करना
न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की
कलयुग का दर्शन करना चाहते हो तो एक मतलबी दोस्त बनाकर देखो, कलयुग का दर्शन उसके अंदर ही हो जाएगा।
दोस्त भी दुश्मन बन जाता है, जब उसे अपना स्वार्थ नजर आता है।
मसला यह भी है इस ज़ालिम दुनिया का .. कोई अगर अच्छा भी है तो वो अच्छा क्यॅ है..
कैसे करू भरोसा गैरो के प्यार पर, अपने ही मजा लेते अपनो की हार पर
सिखा दिया दुनिया ने मुझे अपनों पे भी शक करना मेरी फ़ितरत में तो था गैरों पे भरोसा करना
न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की
कलयुग का दर्शन करना चाहते हो तो एक मतलबी दोस्त बनाकर देखो, कलयुग का दर्शन उसके अंदर ही हो जाएगा।
दोस्त भी दुश्मन बन जाता है, जब उसे अपना स्वार्थ नजर आता है।
मसला यह भी है इस ज़ालिम दुनिया का .. कोई अगर अच्छा भी है तो वो अच्छा क्यॅ है..