मसला यह भी है इस ज़ालिम दुनिया का .. कोई अगर अच्छा भी है तो वो अच्छा क्यॅ है..
दोस्तों की औकात तो हमे तब पता चलती है जब हम संकट मे होते है।
मुखौटे बचपन में देखे थे मेले में टंगे हुए समझ बढ़ी तो देखा लोगों पे है चढ़े हुऐ
न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की
अपनों के लिए हार स्वीकार लेना हमे मंजूर है, लेकिन बात तो यही है कि अपने ही हमे हारने पर मजबूर कर देते है।
देख के दुनिया अब हम भी बदलेंगे मिजाज़ रिश्ता सब से होगा लेकिन वास्ता किसी से नहीं
मसला यह भी है इस ज़ालिम दुनिया का .. कोई अगर अच्छा भी है तो वो अच्छा क्यॅ है..
दोस्तों की औकात तो हमे तब पता चलती है जब हम संकट मे होते है।
मुखौटे बचपन में देखे थे मेले में टंगे हुए समझ बढ़ी तो देखा लोगों पे है चढ़े हुऐ
न जाने कैसी नज़र लगी है ज़माने की अब वजह नहीं मिलती मुस्कुराने की
अपनों के लिए हार स्वीकार लेना हमे मंजूर है, लेकिन बात तो यही है कि अपने ही हमे हारने पर मजबूर कर देते है।
देख के दुनिया अब हम भी बदलेंगे मिजाज़ रिश्ता सब से होगा लेकिन वास्ता किसी से नहीं