अजीब दस्तूर है, मोहब्बत का, रूठ कोई जाता है, टूट कोई जाता है

अजीब दस्तूर है, मोहब्बत का, रूठ कोई जाता है, टूट कोई जाता है

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मायने खो देते हैं वो जवाब, जो वक्त पर नहीं मिलते !!

सच कहूँ आज पहली दफा लगा की दूरियाँ बड़ी ज़ालिम हैं

तेरी नाराज़गी वाजिब है दोस्त.. मैं भी खुद से खुश नहीं हूं आजकल...

खुद पर भरोसा करना सिख़लो सहारा चाहे कितना ही सच्चा हो एक ना एक दिन साथ छोड़ ही देता हैं

मेरे ग़म को कोई नहीं समझ सका क्यों के मुझे आदत थी मुस्कराने की

जब 'मतलब' ना होतो लोग बोलना तो दूर देखना तक छोड़ देते है .

मायने खो देते हैं वो जवाब, जो वक्त पर नहीं मिलते !!

सच कहूँ आज पहली दफा लगा की दूरियाँ बड़ी ज़ालिम हैं

तेरी नाराज़गी वाजिब है दोस्त.. मैं भी खुद से खुश नहीं हूं आजकल...

खुद पर भरोसा करना सिख़लो सहारा चाहे कितना ही सच्चा हो एक ना एक दिन साथ छोड़ ही देता हैं

मेरे ग़म को कोई नहीं समझ सका क्यों के मुझे आदत थी मुस्कराने की

जब 'मतलब' ना होतो लोग बोलना तो दूर देखना तक छोड़ देते है .