अजीब दस्तूर है, मोहब्बत का, रूठ कोई जाता है, टूट कोई जाता है

अजीब दस्तूर है, मोहब्बत का, रूठ कोई जाता है, टूट कोई जाता है

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कई बार ऐसा भी होता है के ज़रूरत से ज़्यादा सोचना भी इंसान की खुशियां छीन लेता है।

हम रोज़ उदास होते हैं और रात गुज़र जाती है एक दिन रात उदास होगी और हम गुज़र जाएंगे

उँगलियाँ निभा रही हैं रिश्ते आजकल ज़ुबाँ से निभाने का वक्त कहाँ

बहुत जल्दी भरोसा कर रहे हो, कभी पहले टूटा नहीं क्या?

अकेली रात बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो

जब से वो मशहूर हो गये हैं, हमसे कुछ दूर हो गये हैं…

कई बार ऐसा भी होता है के ज़रूरत से ज़्यादा सोचना भी इंसान की खुशियां छीन लेता है।

हम रोज़ उदास होते हैं और रात गुज़र जाती है एक दिन रात उदास होगी और हम गुज़र जाएंगे

उँगलियाँ निभा रही हैं रिश्ते आजकल ज़ुबाँ से निभाने का वक्त कहाँ

बहुत जल्दी भरोसा कर रहे हो, कभी पहले टूटा नहीं क्या?

अकेली रात बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो

जब से वो मशहूर हो गये हैं, हमसे कुछ दूर हो गये हैं…