मेरे दिल से खेल तो रहे हो तुम पर...... जरा सम्भल के...... ये थोडा टूटा हुआ है कहीं तुम्हे ही लग ना जाए

मेरे दिल से खेल तो रहे हो तुम पर...... जरा सम्भल के...... ये थोडा टूटा हुआ है कहीं तुम्हे ही लग ना जाए

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तुम ठहर नहीं सकते... जानती हूँ.... मगर.. मैं तो तुम्हारे साथ... चल सकती हूँ ना

जिनको साथ नहीं देना होता वो अक्सर रूठ जाया करते हैं

शक तो था मोहब्बत में नुक़सान होगा, पर सारा हमारा ही होगा ये मालूम न था

कुछ तो है तुझसे मेरा रिश्ता वर्ण कोई गैर इतना भी याद नहीं आता

उसे गजब का शौंक है हरियाली का, रोज आकर जख्मों को हरा कर जाती है

अकेली रात बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो

तुम ठहर नहीं सकते... जानती हूँ.... मगर.. मैं तो तुम्हारे साथ... चल सकती हूँ ना

जिनको साथ नहीं देना होता वो अक्सर रूठ जाया करते हैं

शक तो था मोहब्बत में नुक़सान होगा, पर सारा हमारा ही होगा ये मालूम न था

कुछ तो है तुझसे मेरा रिश्ता वर्ण कोई गैर इतना भी याद नहीं आता

उसे गजब का शौंक है हरियाली का, रोज आकर जख्मों को हरा कर जाती है

अकेली रात बोलती बहुत है लेकिन सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो