खुदा जाने कोनसा गुनाह कर बैठे हैं हम कि तम्मनाओं वाली उम्र में तजुर्बे मिल रहे हैं
कभी कभी इंसान ना टूटता है ना बिखरता है बस हार जाता है कभी किस्मत से तो कभी अपनों से
वो जो हमसे नफरत करते हैं, हम तो आज भी सिर्फ उन पर मरते हैं,
"जब हम रिश्तो के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते तो वक़्त हमारे बीच से रिश्तो को निकाल देता है."
मेरी याद क़यामत की तरह है एक दिन ज़रूर आएगी
किताबों सी शख्सियत दे दे मालिक...सब कुछ बोल दूँ खामोश रहकर....
खुदा जाने कोनसा गुनाह कर बैठे हैं हम कि तम्मनाओं वाली उम्र में तजुर्बे मिल रहे हैं
कभी कभी इंसान ना टूटता है ना बिखरता है बस हार जाता है कभी किस्मत से तो कभी अपनों से
वो जो हमसे नफरत करते हैं, हम तो आज भी सिर्फ उन पर मरते हैं,
"जब हम रिश्तो के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते तो वक़्त हमारे बीच से रिश्तो को निकाल देता है."
मेरी याद क़यामत की तरह है एक दिन ज़रूर आएगी
किताबों सी शख्सियत दे दे मालिक...सब कुछ बोल दूँ खामोश रहकर....