सुनो ना… हम पर मोहब्बत नही आती तुम्हें, रहम तो आता होगा?
हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब हैं, हाथ के अन्दर हैं पर काबू से बाहर.
मोहब्बत किससे और कब हो जाये अदांजा नहीं होता, ये वो घर है, जिसका दरवाजा नहीं होता.
कितने दर्दनाक थे वो मंजर जब हम बिछड़े थे उसने कहा था जीना भी नहीं और रोना भी नहीं.
धोखा देती है शरीफ चेहरों की चमक अक्सर, हर कांच का टूकड़ा हीरा नहीं होता.
इस दुनिया मेँ अजनबी रहना ही ठीक है, लोग बहुत तकलीफ देते है अक्सर अपना बना कर !
सुनो ना… हम पर मोहब्बत नही आती तुम्हें, रहम तो आता होगा?
हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब हैं, हाथ के अन्दर हैं पर काबू से बाहर.
मोहब्बत किससे और कब हो जाये अदांजा नहीं होता, ये वो घर है, जिसका दरवाजा नहीं होता.
कितने दर्दनाक थे वो मंजर जब हम बिछड़े थे उसने कहा था जीना भी नहीं और रोना भी नहीं.
धोखा देती है शरीफ चेहरों की चमक अक्सर, हर कांच का टूकड़ा हीरा नहीं होता.
इस दुनिया मेँ अजनबी रहना ही ठीक है, लोग बहुत तकलीफ देते है अक्सर अपना बना कर !