ऐसा करो, बिछड़ना है तो, रूह से निकल जाओ, रही बात दिल की, उसे हम देख लेंगे.
तुम्हे ना पाना शायद बेहतर है, पा के फिर से तुम्हे गवाने से.
हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब हैं, हाथ के अन्दर हैं पर काबू से बाहर.
तमन्नाओं की महफिल तो हर कोई सजाता है.. मगर पूरी उसी की होती है यहां साहब..जो लिखाकर लाता है.
वो बोलते रहे हम सुनते रहे, जवाब आँखों में था वो जुबान में ढूंढते रहे.
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा गुनाह करना हैं!
ऐसा करो, बिछड़ना है तो, रूह से निकल जाओ, रही बात दिल की, उसे हम देख लेंगे.
तुम्हे ना पाना शायद बेहतर है, पा के फिर से तुम्हे गवाने से.
हाथ की लकीरें भी कितनी अजीब हैं, हाथ के अन्दर हैं पर काबू से बाहर.
तमन्नाओं की महफिल तो हर कोई सजाता है.. मगर पूरी उसी की होती है यहां साहब..जो लिखाकर लाता है.
वो बोलते रहे हम सुनते रहे, जवाब आँखों में था वो जुबान में ढूंढते रहे.
जिसकी सजा तुम हो, मुझे ऐसा गुनाह करना हैं!