कल तक थी जो जान, आज बन गयी अनजान.
कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़... ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया...!
सफर में कही तो दगा खा गए हम जहाँ से चले थे वही आ गए हम
आज भी एक सवाल छिपा है.. दिल के किसी कोने मैं.. की क्या कमी रह गई थी तेरा होने में.
क्यों लगता है वो आसपास है जिसका दूर तक कोई सुराग नहीं।
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं
कल तक थी जो जान, आज बन गयी अनजान.
कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़... ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया...!
सफर में कही तो दगा खा गए हम जहाँ से चले थे वही आ गए हम
आज भी एक सवाल छिपा है.. दिल के किसी कोने मैं.. की क्या कमी रह गई थी तेरा होने में.
क्यों लगता है वो आसपास है जिसका दूर तक कोई सुराग नहीं।
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं