कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।
उस हंसती हुई तस्वीर को क्या मालूम की कोई उसे देख कितने रोता है
तुम्हारे बिना रह तो सकती हूँ... मगर.. खुश नहीं रह सकती
ढूंढ़ रहा हु लेकिन नाकाम हु अभी तक, वो लम्हा जिस में तुम याद ना आये,
कितने शौक से छोड़ दिया तुमने बात करना जैसे सदियों से तेरे ऊपर कोई बोझ थे हम
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं
कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।
उस हंसती हुई तस्वीर को क्या मालूम की कोई उसे देख कितने रोता है
तुम्हारे बिना रह तो सकती हूँ... मगर.. खुश नहीं रह सकती
ढूंढ़ रहा हु लेकिन नाकाम हु अभी तक, वो लम्हा जिस में तुम याद ना आये,
कितने शौक से छोड़ दिया तुमने बात करना जैसे सदियों से तेरे ऊपर कोई बोझ थे हम
अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं