क़दर तो वो होती है जो किसी की मौजूदगी में हो, जो किसी के बाद हो.... उसे पछतावा कहते हैं ।
सिर्फ खड़े होकर पानी देखने से आप नदी नहीं पार कर सकते
हमारी हार इसमें नहीं है की कोई दूसरा हमे नहीं पहचानता, हार इसमें है की हम खुद अपने आप को नहीं पहचान पाते
आपकी नाजायज कमाई का लाभ कोई भी उठा सकता है पर आपके नाजायज कर्मो का फल आपको खुद ही भुगतना पड़ता है...
त्याग के बिना कुछ भी पाना संभव नही क्योंकि सांस लेने के लिए भी पहले सांस छोड़नी पड़ती है.।
किसी का हाथ तभी पकड़ना जब आप हर मुसीबत में उसका साथ दे सको
क़दर तो वो होती है जो किसी की मौजूदगी में हो, जो किसी के बाद हो.... उसे पछतावा कहते हैं ।
सिर्फ खड़े होकर पानी देखने से आप नदी नहीं पार कर सकते
हमारी हार इसमें नहीं है की कोई दूसरा हमे नहीं पहचानता, हार इसमें है की हम खुद अपने आप को नहीं पहचान पाते
आपकी नाजायज कमाई का लाभ कोई भी उठा सकता है पर आपके नाजायज कर्मो का फल आपको खुद ही भुगतना पड़ता है...
त्याग के बिना कुछ भी पाना संभव नही क्योंकि सांस लेने के लिए भी पहले सांस छोड़नी पड़ती है.।
किसी का हाथ तभी पकड़ना जब आप हर मुसीबत में उसका साथ दे सको