पिता, माता अग्नि, आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
ज़िंदगी में समस्या देने वाले की हस्ती कितनी भी बड़ी क्यों न हो.... पर भगवान की "कृपादृष्टि" से बड़ी नहीं हो सकती!!
गलतियों से न सीखना ही एकमात्र गलती होती है
भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।
हमारा 'व्यवहार' कई बार हमारे 'ज्ञान' से अधिक 'अच्छा' साबित होता है। क्योंकि जीवन में जब 'विषम' परिस्थितियां आती हैं तब ज्ञान 'हार' सकता है परन्तु 'व्यवहार' से हमेशा 'जीत' होने की 'संभावना' रहती है
देश में "राजा" समाज में "गुरु" परिवार में "पिता" घर में "स्त्री" ये कभी "साधारण" नहीं होते क्योंकि ~ निर्माण और प्रलय ~ इन्हीं के "हाथ" में होता है
पिता, माता अग्नि, आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
ज़िंदगी में समस्या देने वाले की हस्ती कितनी भी बड़ी क्यों न हो.... पर भगवान की "कृपादृष्टि" से बड़ी नहीं हो सकती!!
गलतियों से न सीखना ही एकमात्र गलती होती है
भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।
हमारा 'व्यवहार' कई बार हमारे 'ज्ञान' से अधिक 'अच्छा' साबित होता है। क्योंकि जीवन में जब 'विषम' परिस्थितियां आती हैं तब ज्ञान 'हार' सकता है परन्तु 'व्यवहार' से हमेशा 'जीत' होने की 'संभावना' रहती है
देश में "राजा" समाज में "गुरु" परिवार में "पिता" घर में "स्त्री" ये कभी "साधारण" नहीं होते क्योंकि ~ निर्माण और प्रलय ~ इन्हीं के "हाथ" में होता है