असल में वही जीवन की चाल समझता है जो सफ़र में धुल को गुलाल समझता है

असल में वही जीवन की चाल समझता है जो सफ़र में धुल को गुलाल समझता है

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सबसे बड़ा गुरु ठोकर हैं खाते जाओगे सीखते जाओगे.

मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।

जीवन मे पछतावा करना छोडो कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हें छोड़ देने पर पछताए।

कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने पर एक बहुमूल्य संपत्ति विकसित होती है, जिसका नाम है

रूठी पत्नी, लुप्त संपत्ति और हाथ से निकली भूमि वापस मिल सकती है, लेकिन मनुष्य जीवन पुनः नहीं मिल सकता, अतः दान-धर्म कर हमें अपना जीवन सफल बनाना चाहिए.

"जिंदगी अपने तरीके से जी कर तो देखिए खुशिया खुद ब खुद तुम्हे ढुंडते आएगी…"

सबसे बड़ा गुरु ठोकर हैं खाते जाओगे सीखते जाओगे.

मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।

जीवन मे पछतावा करना छोडो कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हें छोड़ देने पर पछताए।

कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने पर एक बहुमूल्य संपत्ति विकसित होती है, जिसका नाम है

रूठी पत्नी, लुप्त संपत्ति और हाथ से निकली भूमि वापस मिल सकती है, लेकिन मनुष्य जीवन पुनः नहीं मिल सकता, अतः दान-धर्म कर हमें अपना जीवन सफल बनाना चाहिए.

"जिंदगी अपने तरीके से जी कर तो देखिए खुशिया खुद ब खुद तुम्हे ढुंडते आएगी…"