ईश्वर ना काष्ठ में है, न मिट्टी में, न ही मूर्ति में. वह केवल भावना में होता है. अतः भावना ही मुख्य है.
इंसान सफल तब होता है जब वो जरूरत और चाहत के बीच फर्क समझ लेता है
मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।
जिंदगी में कुछ करना और कुछ बनना हैं, तो अकेले रहने की आदत डालो
खुशी का पहला उपाय पिछली बातों पर बहुत अधिक विचार करने से बचें
जहाँ दूसरों को समझाना मुश्किल हो जाये, वहाँ खुद को समझा लेना ही बेहतर होता है
ईश्वर ना काष्ठ में है, न मिट्टी में, न ही मूर्ति में. वह केवल भावना में होता है. अतः भावना ही मुख्य है.
इंसान सफल तब होता है जब वो जरूरत और चाहत के बीच फर्क समझ लेता है
मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।
जिंदगी में कुछ करना और कुछ बनना हैं, तो अकेले रहने की आदत डालो
खुशी का पहला उपाय पिछली बातों पर बहुत अधिक विचार करने से बचें
जहाँ दूसरों को समझाना मुश्किल हो जाये, वहाँ खुद को समझा लेना ही बेहतर होता है