आदत बदल सी गई है वक़्त काटने की, हिम्मत ही नहीं होती अपना दर्द बांटने की

आदत बदल सी गई है वक़्त काटने की, हिम्मत ही नहीं होती अपना दर्द बांटने की

Share:

More Like This

क्यों लगता है वो आसपास है जिसका दूर तक कोई सुराग नहीं।

मेरी मोहब्बत की कातिल मेरी ग़रीबी ठहरी उसे ले गए ऊँचे मकाँ वाले....!

मोत से तो दुनिया मरती हैं आशीक तो बस प्यार से ही मर जाता हैं

ना शाखों ने जगह दी ,, ना हवाओं ने बख्शा..! मैं हूँ टुटा हुआ पत्ता. आवारा ना बनता तो क्या करता

हर रोज़, हर वक़्त तुम्हारा ही ख्याल ना जाने किस कर्ज़ की किश्त हो तुम

कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।

क्यों लगता है वो आसपास है जिसका दूर तक कोई सुराग नहीं।

मेरी मोहब्बत की कातिल मेरी ग़रीबी ठहरी उसे ले गए ऊँचे मकाँ वाले....!

मोत से तो दुनिया मरती हैं आशीक तो बस प्यार से ही मर जाता हैं

ना शाखों ने जगह दी ,, ना हवाओं ने बख्शा..! मैं हूँ टुटा हुआ पत्ता. आवारा ना बनता तो क्या करता

हर रोज़, हर वक़्त तुम्हारा ही ख्याल ना जाने किस कर्ज़ की किश्त हो तुम

कुछ रुकी रुकी सी है ज़िन्दगी, कुछ चलते फिरते से है हम।