अगर सफल होना हैं तो गुस्सा, बेइज्जती, अपमान बहुत जरूरी हैं
जिस रिश्ते में हमारी अहमियत खत्म हो चुकी हो, उसे चुप चाप छोड़ देना ही बेहतर है
लोगो के पास बहुत कुछ है मगर मुश्किल यह है की भरोसे ओर शक है और अपने शक पर भरोसा है
जो आपके शब्दों का "मूल्य" नहीं समझता उसके सामने मौन रहना ही बेहतर है.
सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।
झूठ का भी अजीब 'जायका' है स्वयं बोलो तो मीठा' लगता है कोई और बोले तो 'कड़वा'
अगर सफल होना हैं तो गुस्सा, बेइज्जती, अपमान बहुत जरूरी हैं
जिस रिश्ते में हमारी अहमियत खत्म हो चुकी हो, उसे चुप चाप छोड़ देना ही बेहतर है
लोगो के पास बहुत कुछ है मगर मुश्किल यह है की भरोसे ओर शक है और अपने शक पर भरोसा है
जो आपके शब्दों का "मूल्य" नहीं समझता उसके सामने मौन रहना ही बेहतर है.
सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।
झूठ का भी अजीब 'जायका' है स्वयं बोलो तो मीठा' लगता है कोई और बोले तो 'कड़वा'