ये जिंदगी तभी तक झंड लगती है जब तक जिंदगी में पैसा ना हो
जो मन मे आए उसे खुलकर पूरे मन से करो क्योंकि एक बार जो वक़्त गुजर गया तो वो वक़्त दुबारा नही आने वाला है
खिचड़ी अगर बर्तन में पके तो बीमार को ठीक कर देती है और यदि दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है
मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।
एक ऐसा लक्ष्य निर्धारित करे जो आपको सुबह बिस्तर से उठने पर मजबूर कर दे
ज़िन्दगी को हमेशा मुस्कुरा के गुजारो क्योंकि आप ये नही जानते कि ये कितनी बाकी है
ये जिंदगी तभी तक झंड लगती है जब तक जिंदगी में पैसा ना हो
जो मन मे आए उसे खुलकर पूरे मन से करो क्योंकि एक बार जो वक़्त गुजर गया तो वो वक़्त दुबारा नही आने वाला है
खिचड़ी अगर बर्तन में पके तो बीमार को ठीक कर देती है और यदि दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है
मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।
एक ऐसा लक्ष्य निर्धारित करे जो आपको सुबह बिस्तर से उठने पर मजबूर कर दे
ज़िन्दगी को हमेशा मुस्कुरा के गुजारो क्योंकि आप ये नही जानते कि ये कितनी बाकी है