कितनी महँगी पड़ी मुझे मुस्कुराने की अदा, सब अकेला छोड़ गए मुझे ये कहकर क़ि तुम तो अकेले भी खुश रह लेते हो

कितनी महँगी पड़ी मुझे मुस्कुराने की अदा, सब अकेला छोड़ गए मुझे ये कहकर क़ि तुम तो अकेले भी खुश रह लेते हो

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जो होकर भी ना हो.. उसका होना कैसा... नाम के रिश्तों से शिकवा कैसा..रोना कैसा....

अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं

रोज़ नहीं पर कभी कभी तो वो शख्स मुझे जरूर सोचता होगा

याद तो रोज करते है उन्हें, पर उन्होने कभी महसूस ही न किया.. ?

सब कुछ ठीक ही चल रहा है ना जाने क्यों उदास हु मैं

मोत से पहेले भी ऎक मौत होती हे..! देखो जरा तुम जुदा होकर किसी से..!

जो होकर भी ना हो.. उसका होना कैसा... नाम के रिश्तों से शिकवा कैसा..रोना कैसा....

अब तो मोहब्बत भी सरकारी नौकरी जैसी लगती है, कम्बख्त ग़रीबों को तो मिलती ही नहीं

रोज़ नहीं पर कभी कभी तो वो शख्स मुझे जरूर सोचता होगा

याद तो रोज करते है उन्हें, पर उन्होने कभी महसूस ही न किया.. ?

सब कुछ ठीक ही चल रहा है ना जाने क्यों उदास हु मैं

मोत से पहेले भी ऎक मौत होती हे..! देखो जरा तुम जुदा होकर किसी से..!