कोई किसी को सिखा नही सकता जब खुद में इच्छा जागती है तभी कोई सिख पाता है
पहले लोगोँ ने सिखाया था कि वक्त बदल जाता है अब वक्त ने सिखा दिया कि लोग भी बदल जाते हैँ
सुख दुख तो अतिथि है, बारी बारी से आएंगे, चले जाएंगे यदि वह नहीं आएंगे तो, हम अनुभव कहां से लाएंगे
तेरे गिरने में तेरी हार नहीं तू इंसान है, अवतार नहीं गिर, उठ, चल, दौड़ फिर भाग क्योंकि जीवन संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं.
जीवन मे सिर्फ वहाँ तक ही "झुकना' चाहिए जहाँ तक सम्बन्धो में "लचकता" और मन मे "आत्मसम्मान" बना रहे
चीजें खुद नहीं होतीं, उन्हें करना पड़ता है
कोई किसी को सिखा नही सकता जब खुद में इच्छा जागती है तभी कोई सिख पाता है
पहले लोगोँ ने सिखाया था कि वक्त बदल जाता है अब वक्त ने सिखा दिया कि लोग भी बदल जाते हैँ
सुख दुख तो अतिथि है, बारी बारी से आएंगे, चले जाएंगे यदि वह नहीं आएंगे तो, हम अनुभव कहां से लाएंगे
तेरे गिरने में तेरी हार नहीं तू इंसान है, अवतार नहीं गिर, उठ, चल, दौड़ फिर भाग क्योंकि जीवन संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं.
जीवन मे सिर्फ वहाँ तक ही "झुकना' चाहिए जहाँ तक सम्बन्धो में "लचकता" और मन मे "आत्मसम्मान" बना रहे
चीजें खुद नहीं होतीं, उन्हें करना पड़ता है