'दिखावा' और 'झूठ' बोलकर व्यव्हार बनाने से अच्छा है, 'सच' बोलकर 'दुश्मन' बना लो, तुम्हारे साथ कभी 'विश्वाश्घात' नहीं होगा...

'दिखावा' और 'झूठ' बोलकर व्यव्हार बनाने से अच्छा है, 'सच' बोलकर 'दुश्मन' बना लो, तुम्हारे साथ कभी 'विश्वाश्घात' नहीं होगा...

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"ज़िन्दगी गुज़र जाती है ये ढूँढने में कि, ढूंढना क्या है अंत में तलाश सिमट जाती है इस सुकून में कि, जो मिला वो भी कहाँ साथ लेकर जाना है "

जो व्यस्त ना हो, वो ही काम आते है व्यस्त रहने वाले खुदगर्ज ही रह जाते है

जब हम बोलना नही जानते थे तो हमारे बोले बिना'माँ' हमारी बातो को समझ जाती थी। और आज हम हर बात पर कहते है छोङो भी 'माँ' आप नही समझोंगी।

बीमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है; जबकि पैसा कछुए की तरह आता है और.खरगोश की तरह जाता है।

ज़िन्दगी बीत जाएगी चार दिन में इसे अपने में नहीं जिओ बल्कि अपनों के साथ जियो।

उन्हें अपना बनाने की भूल कभी मत करना जो हमेशा अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहते है।

"ज़िन्दगी गुज़र जाती है ये ढूँढने में कि, ढूंढना क्या है अंत में तलाश सिमट जाती है इस सुकून में कि, जो मिला वो भी कहाँ साथ लेकर जाना है "

जो व्यस्त ना हो, वो ही काम आते है व्यस्त रहने वाले खुदगर्ज ही रह जाते है

जब हम बोलना नही जानते थे तो हमारे बोले बिना'माँ' हमारी बातो को समझ जाती थी। और आज हम हर बात पर कहते है छोङो भी 'माँ' आप नही समझोंगी।

बीमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है; जबकि पैसा कछुए की तरह आता है और.खरगोश की तरह जाता है।

ज़िन्दगी बीत जाएगी चार दिन में इसे अपने में नहीं जिओ बल्कि अपनों के साथ जियो।

उन्हें अपना बनाने की भूल कभी मत करना जो हमेशा अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहते है।