दुःख से पता नहीं क्यों लोग डरते हैं लोग जबकि हमारे जीवन की शुरुआत ही रोने से हुई है.

दुःख से पता नहीं क्यों लोग डरते हैं लोग जबकि हमारे जीवन की शुरुआत ही रोने से हुई है.

Share:

More Like This

जब बच्चे थे तब अधूरे एहसास, टूटे सपने, अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने सब अच्छे लगते थे.

इस दिल ने कभी भी किसी का बुरा नहीं चाहा, ये बात और है कि मुझे ये साबित करना नहीं आया।

अगर दुआ कबूल न हो तो लोग भगवान भी बदल देते हैं.

जिन्हें मालूम है कि अकेलापन क्या होता है, वो लोग हमेशा दूसरो के लिए हाजिर रहते है।

वो मासूम रोटी चुरा कर चोर बन गया, और लोग मुल्क खा गए, कानून लिखते-लिखते।

कसूर किसी का भी हो मगर, आसूँ हमेशा बेक़सूर के ही निकलते हैं

जब बच्चे थे तब अधूरे एहसास, टूटे सपने, अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने सब अच्छे लगते थे.

इस दिल ने कभी भी किसी का बुरा नहीं चाहा, ये बात और है कि मुझे ये साबित करना नहीं आया।

अगर दुआ कबूल न हो तो लोग भगवान भी बदल देते हैं.

जिन्हें मालूम है कि अकेलापन क्या होता है, वो लोग हमेशा दूसरो के लिए हाजिर रहते है।

वो मासूम रोटी चुरा कर चोर बन गया, और लोग मुल्क खा गए, कानून लिखते-लिखते।

कसूर किसी का भी हो मगर, आसूँ हमेशा बेक़सूर के ही निकलते हैं