खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

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डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाले दर्द है.

अरस्तु

ऐसा लगता है, कि... मेरे शरीर का हर दूसरा हिस्सा भी अब टूट गया है।

आंसू वे शब्द हैं, जिन्हें ना तो जुबां बयां कर सकती और ना ही दिल झेल सकता है।

कभी-कभी दर्द इस हद तक बढ़ जाता है, की "रोते-रोते" सो जाने के अलावा और कोई चारा ही नही बचता।

जो लोग दर्द को समझते हैं वो लोग कभी भी दर्द की वजह नहीं बनते…

एक वक़्त पे आपको ये मान लेना पड़ता हौ की, कुछ लोग बस आपके दिल में ही रहेंगे, आपके ज़िंदगी में नही।

डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाले दर्द है.

अरस्तु

ऐसा लगता है, कि... मेरे शरीर का हर दूसरा हिस्सा भी अब टूट गया है।

आंसू वे शब्द हैं, जिन्हें ना तो जुबां बयां कर सकती और ना ही दिल झेल सकता है।

कभी-कभी दर्द इस हद तक बढ़ जाता है, की "रोते-रोते" सो जाने के अलावा और कोई चारा ही नही बचता।

जो लोग दर्द को समझते हैं वो लोग कभी भी दर्द की वजह नहीं बनते…

एक वक़्त पे आपको ये मान लेना पड़ता हौ की, कुछ लोग बस आपके दिल में ही रहेंगे, आपके ज़िंदगी में नही।