खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

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कभी-कभी दर्द इस हद तक बढ़ जाता है, की "रोते-रोते" सो जाने के अलावा और कोई चारा ही नही बचता।

आप कर भी क्या सकते है, जब..... वो इंसान, जो आपका रोना बंद कर सकता है, बही आपको रुला रहा है...

अब तो ऐसा लगता है की, मैं ही वो अकेला इंसान हूं, जिसने मुझे निराश नहीं किया।

आँसू वे शब्द हैं, जिनको दिल कभी बयां नहीं कर सकता है।

अपने दिल में किसीको खास जगह मत दो, उस जगह को देना आसान है, पर जब सामने वाले को इसकी कदर ना हो तब दर्द बहुत ज़्यादा होता है।

कभी लगाव ज़्यादा था, इसलिए... आज दर्द ज़्यादा है।

कभी-कभी दर्द इस हद तक बढ़ जाता है, की "रोते-रोते" सो जाने के अलावा और कोई चारा ही नही बचता।

आप कर भी क्या सकते है, जब..... वो इंसान, जो आपका रोना बंद कर सकता है, बही आपको रुला रहा है...

अब तो ऐसा लगता है की, मैं ही वो अकेला इंसान हूं, जिसने मुझे निराश नहीं किया।

आँसू वे शब्द हैं, जिनको दिल कभी बयां नहीं कर सकता है।

अपने दिल में किसीको खास जगह मत दो, उस जगह को देना आसान है, पर जब सामने वाले को इसकी कदर ना हो तब दर्द बहुत ज़्यादा होता है।

कभी लगाव ज़्यादा था, इसलिए... आज दर्द ज़्यादा है।