खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

खेल है जिंदगी, आँख मिचौली का... मजबूरिया छिपी है, हर काम के पीछे, स्वार्थ छिपा है, हर सलाम के पीछे...

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मानसिक पीड़ा का एकमात्र मारक शारीरिक पीड़ा है . ||

डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाले दर्द है.

अरस्तु

मेरी मुस्कुराहट के पीछे एक टूटा हुआ दिल है, मैं ठीक नहीं हूं, मैं बिल्कुल भी ठीक नही हूं।

लबो पर जब किसी के दर्द का अफ़साना आता है, हमें रह-रह कर अपना दिल-ए-दीवाना आता है।

आंसू वे शब्द हैं, जिन्हें ना तो जुबां बयां कर सकती और ना ही दिल झेल सकता है।

न हर्फ़-ए-शिकायत न इश्क़ रहा तुमसे जितना दिया था हँस कर बड़ी ख़ूबसूरती से मुस्कुराकर छीन लिया तुमने

मानसिक पीड़ा का एकमात्र मारक शारीरिक पीड़ा है . ||

डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाले दर्द है.

अरस्तु

मेरी मुस्कुराहट के पीछे एक टूटा हुआ दिल है, मैं ठीक नहीं हूं, मैं बिल्कुल भी ठीक नही हूं।

लबो पर जब किसी के दर्द का अफ़साना आता है, हमें रह-रह कर अपना दिल-ए-दीवाना आता है।

आंसू वे शब्द हैं, जिन्हें ना तो जुबां बयां कर सकती और ना ही दिल झेल सकता है।

न हर्फ़-ए-शिकायत न इश्क़ रहा तुमसे जितना दिया था हँस कर बड़ी ख़ूबसूरती से मुस्कुराकर छीन लिया तुमने