माता-पिता की जितनी जरुरत हमें बचपन में होती है उतनी ही जरुरत उन्हें हमारी उनके बुढ़ापे में होती है

माता-पिता की जितनी जरुरत हमें बचपन में होती है उतनी ही जरुरत उन्हें हमारी उनके बुढ़ापे में होती है

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घुस्सा आने पर चिल्लाने के लिए ताकत नहीं लगती, घुस्सा आने पर शांत बैठने पर ताकत ज़रूर लगती है।

इतना भी आसान नहीं होता अपनी जिन्दगी को जी पाना, बहुत लोगों को खटकने लगते हैं जब हम खुद को जीने लगते हैं’।

अहसास बदल जाता है वक्त के साथ और पता भी नही चलता है, क्योंकि मोहब्बत और नफरत एक ही दिल से जो होती हैं.

रिश्ता हमेशा दिल से होना चाहिए शब्दों से नहीं.

वो लोग बहुत मजबूत हो जाते है, जिनके पास खोने के लिए कुछ भी नही होता।

कहानियां कुछ यूँ ही अधूरी रह जाती है, कभी पन्ने कम पड़ जाते है तो कभी श्याही सूख जाती है।

घुस्सा आने पर चिल्लाने के लिए ताकत नहीं लगती, घुस्सा आने पर शांत बैठने पर ताकत ज़रूर लगती है।

इतना भी आसान नहीं होता अपनी जिन्दगी को जी पाना, बहुत लोगों को खटकने लगते हैं जब हम खुद को जीने लगते हैं’।

अहसास बदल जाता है वक्त के साथ और पता भी नही चलता है, क्योंकि मोहब्बत और नफरत एक ही दिल से जो होती हैं.

रिश्ता हमेशा दिल से होना चाहिए शब्दों से नहीं.

वो लोग बहुत मजबूत हो जाते है, जिनके पास खोने के लिए कुछ भी नही होता।

कहानियां कुछ यूँ ही अधूरी रह जाती है, कभी पन्ने कम पड़ जाते है तो कभी श्याही सूख जाती है।